श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.30.31

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 30 · अथ त्रिंशोऽध्यायः

वरं वृणीमहेऽथापि१ नाथ त्वत्परतः परात्।

न२ ह्यन्तस्त्वद्विभूतीनां सोऽनन्त इति गीयसे३॥ ३१

varaṃ vṛṇīmahe'thāpi nātha tvatparataḥ parāt|

na hyantastvadvibhūtīnāṃ so'nanta iti gīyase|| 31

अर्थ

तथापि, नाथ! हम एक वर आपसे अवश्य माँगते हैं। प्रभो! आप प्रकृति आदिसे परे हैं और आपकी विभूतियोंका भी कोई अन्त नहीं है; इसलिये आप ‘अनन्त’ कहे जाते हैं॥ ३१॥

टिप्पणियाँ

  1. १

    प्रा० पा०—व्यापि।

    (मुद्रित पृष्ठ 567)
  2. २

    प्रा० पा०—न ह्यन्तो यद्वि०।

    (मुद्रित पृष्ठ 567)
  3. ३

    प्रा० पा०—गीयते।

    (मुद्रित पृष्ठ 567)

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