॥ श्रीहरिः ॥
चाक्षुषे त्वन्तरे प्राप्ते प्राक्सर्गे कालविद्रुते।
यः ससर्ज प्रजा इष्टाः स दक्षो दैवचोदितः॥ ४९
cākṣuṣe tvantare prāpte prāksarge kālavidrute|
yaḥ sasarja prajā iṣṭāḥ sa dakṣo daivacoditaḥ|| 49
अर्थ
इन्हीं दक्षने चाक्षुष मन्वन्तर आनेपर, जब कालक्रमसे पूर्वसर्ग नष्ट हो गया, भगवान्की प्रेरणासे इच्छानुसार नवीन प्रजा उत्पन्न की॥ ४९॥✎ 424 425 1349
चाक्षुषे त्वन्तरे प्राप्ते प्राक्सर्गे कालविद्रुते।
यः ससर्ज प्रजा इष्टाः स दक्षो दैवचोदितः॥ ४९
इन्हीं दक्षने चाक्षुष मन्वन्तर आनेपर, जब कालक्रमसे पूर्वसर्ग नष्ट हो गया, भगवान्की प्रेरणासे इच्छानुसार नवीन प्रजा उत्पन्न की॥ ४९॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.30.49 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 569) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/30/49/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (3)
- #424 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्की
- #425 शब्दोंके बीचका स्थान: श्रीभगवान् ने → श्रीभगवान्ने
- #1349 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): श्रीहरि-की → श्रीहरिकी