गरुड़जीके कंधेपर बैठे हुए श्रीभगवान् ऐसे जान पड़ते थे, मानो सुमेरुके शिखरपर कोई श्याम घटा छायी हो। उनके श्रीअंगमें मनोहर पीताम्बर और कण्ठमें कौस्तुभमणि सुशोभित थी। अपनी दिव्य प्रभासे वे सब दिशाओंका अन्धकार दूर कर रहे थे॥ ५॥
सुपर्णस्कन्धमारूढो मेरुशृंगमिवाम्बुदः।
पीतवासा मणिग्रीवः कुर्वन् वितिमिरा दिशः॥ ५
गरुड़जीके कंधेपर बैठे हुए श्रीभगवान् ऐसे जान पड़ते थे, मानो सुमेरुके शिखरपर कोई श्याम घटा छायी हो। उनके श्रीअंगमें मनोहर पीताम्बर और कण्ठमें कौस्तुभमणि सुशोभित थी। अपनी दिव्य प्रभासे वे सब दिशाओंका अन्धकार दूर कर रहे थे॥ ५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.30.5 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 564) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/30/5/