श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.31.1

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 31 · अथैकत्रिंशोऽध्यायः

अथैकत्रिंशोऽध्यायः

प्रचेताओंको श्रीनारदजीका उपदेश और उनका परमपद-लाभ

मैत्रेय उवाच

तत उत्पन्‍नविज्ञाना आश्‍वधोक्षजभाषितम्।

स्मरन्त आत्मजे भार्यां विसृज्य प्राव्रजन् गृहात्॥ १

tata utpannavijñānā āśvadhokṣajabhāṣitam|

smaranta ātmaje bhāryāṃ visṛjya prāvrajan gṛhāt|| 1

अर्थ

श्रीमैत्रेयजी कहते हैं—विदुरजी! दस लाख वर्ष बीत जानेपर जब प्रचेताओंको विवेक हुआ, तब उन्हें भगवान्‌के वाक्योंकी याद आयी और वे अपनी भार्या मारिषाको पुत्रके पास छोड़कर तुरंत घरसे निकल पड़े॥ १॥

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