श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.31.13

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 31 · अथैकत्रिंशोऽध्यायः

श्रेयसामपि सर्वेषामात्मा ह्यवधिरर्थतः।

सर्वेषामपि भूतानां हरिरात्माऽऽ५त्मदः प्रियः॥ १३

śreyasāmapi sarveṣāmātmā hyavadhirarthataḥ|

sarveṣāmapi bhūtānāṃ harirātmā''tmadaḥ priyaḥ|| 13

अर्थ

वास्तवमें समस्त कल्याणोंकी अवधि आत्मा ही है और आत्मज्ञान प्रदान करनेवाले श्रीहरि ही सम्पूर्ण प्राणियोंकी प्रिय आत्मा हैं॥ १३॥✎ 427

टिप्पणियाँ

  1. ५

    प्रा० पा०—रात्मपदः प्रि०।

    (मुद्रित पृष्ठ 571)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #427 शब्दोंके बीचका स्थान: श्रीभगवान् की → श्रीभगवान्‌की

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