जिस प्रकार वर्षाकालमें जल सूर्यके तापसे उत्पन्न होता है और ग्रीष्म-ऋतुमें उसीकी किरणोंमें पुनः प्रवेश कर जाता है तथा जैसे समस्त चराचर भूत पृथ्वीसे उत्पन्न होते हैं और फिर उसीमें मिल जाते हैं, उसी प्रकार चेतना-चेतनात्मक यह समस्त प्रपंच श्रीहरिसे ही उत्पन्न होता है और उन्हींमें लीन हो जाता है॥ १५॥✎ 427
यथैव सूर्यात्प्रभवन्ति वारः
पुनश्च तस्मिन् प्रविशन्ति काले।
भूतानि भूमौ स्थिरजंगमानि
तथा हरावेव गुणप्रवाहः॥ १५
जिस प्रकार वर्षाकालमें जल सूर्यके तापसे उत्पन्न होता है और ग्रीष्म-ऋतुमें उसीकी किरणोंमें पुनः प्रवेश कर जाता है तथा जैसे समस्त चराचर भूत पृथ्वीसे उत्पन्न होते हैं और फिर उसीमें मिल जाते हैं, उसी प्रकार चेतना-चेतनात्मक यह समस्त प्रपंच श्रीहरिसे ही उत्पन्न होता है और उन्हींमें लीन हो जाता है॥ १५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.31.15 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 571) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/31/15/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#427 शब्दोंके बीचका स्थान: श्रीभगवान् की → श्रीभगवान्की