अतः तुम ब्रह्मादि समस्त लोकपालोंके भी अधीश्वर श्रीहरिको अपनेसे अभिन्न मानते हुए भजो; क्योंकि वे ही समस्त देहधारियोंके एकमात्र आत्मा हैं। वे ही जगत्के निमित्तकारण काल, उपादानकारण प्रधान और नियन्ता पुरुषोत्तम हैं तथा अपनी कालशक्तिसे वे ही इस गुणोंके प्रवाहरूप प्रपंचका संहार कर देते हैं॥ १८॥✎ 428429430
तेनैकमात्मानमशेषदेहिनां
कालं प्रधानं पुरुषं परेशम्।
स्वतेजसा ध्वस्तगुणप्रवाह-
मात्मैकभावेन भजध्वमद्धा॥ १८
अतः तुम ब्रह्मादि समस्त लोकपालोंके भी अधीश्वर श्रीहरिको अपनेसे अभिन्न मानते हुए भजो; क्योंकि वे ही समस्त देहधारियोंके एकमात्र आत्मा हैं। वे ही जगत्के निमित्तकारण काल, उपादानकारण प्रधान और नियन्ता पुरुषोत्तम हैं तथा अपनी कालशक्तिसे वे ही इस गुणोंके प्रवाहरूप प्रपंचका संहार कर देते हैं॥ १८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.31.18 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 572) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/31/18/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (3)
#428 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् में → भगवान्में