श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.4.12

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 4 · अथ चतुर्थोऽध्यायः

दोषान् परेषां हि गुणेषु साधवो

गृह्णन्ति केचिन्‍न भवादृशा द्विज।

गुणांश्‍च फल्गून् बहुलीकरिष्णवो

महत्तमास्तेष्वविदद्भवानघम् ॥ १२

doṣān pareṣāṃ hi guṇeṣu sādhavo

gṛhṇanti kecinna bhavādṛśā dvija|

guṇāṃśca phalgūn bahulīkariṣṇavo

mahattamāsteṣvavidadbhavānagham || 12

अर्थ

द्विजवर! आप-जैसे लोग दूसरोंके गुणोंमें भी दोष ही देखते हैं, किन्तु कोई साधुपुरुष ऐसा नहीं करते। जो लोग—दोष देखनेकी बात तो अलग रही—दूसरोंके थोड़ेसे गुणको भी बड़े रूपमें देखना चाहते हैं, वे सबसे श्रेष्ठ हैं। खेद है कि आपने ऐसे महापुरुषोंपर भी दोषारोपण ही किया॥ १२॥✎ 358

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #358 शब्दोंके बीचका स्थान: शंकरसेबड़ा → शंकरसे बड़ा

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें