श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.4.17

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 4 · अथ चतुर्थोऽध्यायः

कर्णौ पिधाय निरयाद्यदकल्प ईशे

धर्मावितर्यसृणिभिर्नृभिरस्यमाने ।

छिन्द्यात्प्रसह्य रुशतीमसतीं प्रभुश्चे-

ज्जिह्वामसूनपि ततो विसृजेत्स धर्मः॥ १७

karṇau pidhāya nirayādyadakalpa īśe

dharmāvitaryasṛṇibhirnṛbhirasyamāne |

chindyātprasahya ruśatīmasatīṃ prabhuśce-

jjihvāmasūnapi tato visṛjetsa dharmaḥ|| 17

अर्थ

यदि निरंकुशलोग धर्ममर्यादाकी रक्षा करनेवाले अपने पूजनीय स्वामीकी निन्दा करें तो अपनेमें उसे दण्ड देनेकी शक्ति न होनेपर कान बंद करके वहाँसे चला जाय और यदि शक्ति हो तो बलपूर्वक पकड़कर उस बकवाद करनेवाली अमंगलरूप दुष्ट जिह्वाको काट डाले। इस पापको रोकनेके लिये स्वयं अपने प्राणतक दे दे, यही धर्म है॥ १७॥

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