श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.4.9

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 4 · अथ चतुर्थोऽध्यायः

अरुद्रभागं तमवेक्ष्य चाध्वरं

पित्रा च देवे कृतहेलनं विभौ।

अनादृता यज्ञसदस्यधीश्‍वरी

चुकोप लोकानिव धक्ष्यती रुषा॥ ९

arudrabhāgaṃ tamavekṣya cādhvaraṃ

pitrā ca deve kṛtahelanaṃ vibhau|

anādṛtā yajñasadasyadhīśvarī

cukopa lokāniva dhakṣyatī ruṣā|| 9

अर्थ

सर्वलोकेश्‍वरी देवी सतीका यज्ञमण्डपमें तो अनादर हुआ ही था, उन्होंने यह भी देखा कि उस यज्ञमें भगवान् शंकरके लिये कोई भाग नहीं दिया गया है और पिता दक्ष उनका बड़ा अपमान कर रहा है। इससे उन्हें बहुत क्रोध हुआ; ऐसा जान पड़ता था मानो वे अपने रोषसे सम्पूर्ण लोकोंको भस्म कर देंगी॥ ९॥

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