भगवान् शंकरके पार्षदोंकी यह भयंकर लीला देखकर तथा उनके कंकड़-पत्थरोंकी मारसे बहुत तंग आकर वहाँ जितने ऋत्विज्, सदस्य और देवतालोग थे, सब-के-सब जहाँ-तहाँ भाग गये॥ १८॥
सर्व एवर्त्विजो दृष्ट्वा सदस्याः सदिवौकसः।
तैरर्द्यमानाः सुभृशं ग्रावभिर्नैकधाद्रवन्॥ १८
भगवान् शंकरके पार्षदोंकी यह भयंकर लीला देखकर तथा उनके कंकड़-पत्थरोंकी मारसे बहुत तंग आकर वहाँ जितने ऋत्विज्, सदस्य और देवतालोग थे, सब-के-सब जहाँ-तहाँ भाग गये॥ १८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.5.18 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 427) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/5/18/