उन्होंने उग्र रूप धारण कर क्रोधके मारे होठ चबाते हुए अपनी एक जटा उखाड़ ली—जो बिजली और आगकी लपटके समान दीप्त हो रही थी—और सहसा खड़े होकर बड़े गम्भीर अट्टहासके साथ उसे पृथ्वीपर पटक दिया॥ २॥✎ 1317
क्रुद्धः सुदष्टोष्ठपुटः स धूर्जटि-
र्जटां तडिद्वह्निसटोग्ररोचिषम्।
उत्कृत्य रुद्रः सहसोत्थितो हसन्
गम्भीरनादो विससर्ज तां भुवि॥ २
उन्होंने उग्र रूप धारण कर क्रोधके मारे होठ चबाते हुए अपनी एक जटा उखाड़ ली—जो बिजली और आगकी लपटके समान दीप्त हो रही थी—और सहसा खड़े होकर बड़े गम्भीर अट्टहासके साथ उसे पृथ्वीपर पटक दिया॥ २॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.5.2 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 424) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/5/2/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#1317 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): नर-मुण्डोंकी → नरमुण्डोंकी