श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.6.18

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 6 · अथ षष्ठोऽध्यायः

खर्जूराम्रातकाम्राद्यैः प्रियालमधुकेंगुदैः।

द्रुमजातिभिरन्यैश्‍च राजितं वेणुकीचकैः॥ १८

kharjūrāmrātakāmrādyaiḥ priyālamadhukeṃgudaiḥ|

drumajātibhiranyaiśca rājitaṃ veṇukīcakaiḥ|| 18

अर्थ

कटहल, गूलर, पीपल, पाकर, बड़, गूगल, भोजवृक्ष, ओषध जातिके पेड़ (केले आदि, जो फल आनेके बाद काट दिये जाते हैं), सुपारी, राजपूग, जामुन, खजूर, आमड़ा, आम, पियाल, महुआ और लिसौड़ा आदि विभिन्‍न प्रकारके वृक्षों तथा पोले और ठोस बाँसके झुरमुटोंसे वह पर्वत बड़ा ही मनोहर मालूम होता है॥ १७-१८॥✎ 1318

यह अर्थ श्लोक 17–18 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1318 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): हैैं॥ → हैं॥

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