यक्षराज कुबेरकी राजधानी उस अलकापुरीको पीछे छोड़कर देवगण सौगन्धिक वनमें आये। वह वन रंग-बिरंगे फल, फूल और पत्तोंवाले अनेकों कल्पवृक्षोंसे सुशोभित था॥ २८॥
हित्वा यक्षेश्वरपुरीं वनं सौगन्धिकं च तत्।
द्रुमैः कामदुघैर्हृद्यं चित्रमाल्यफलच्छदैः॥ २८
यक्षराज कुबेरकी राजधानी उस अलकापुरीको पीछे छोड़कर देवगण सौगन्धिक वनमें आये। वह वन रंग-बिरंगे फल, फूल और पत्तोंवाले अनेकों कल्पवृक्षोंसे सुशोभित था॥ २८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.6.28 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 430) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/6/28/