प्राप्तं किम्पुरुषैर्दृष्ट्वा त आराद्ददृशुर्वटम्॥ ३१
vaidūryakṛtasopānā vāpya utpalamālinīḥ|
prāptaṃ kimpuruṣairdṛṣṭvā ta ārāddadṛśurvaṭam|| 31
अर्थ
बावलियोंकी सीढ़ियाँ वैदूर्य-मणिकी बनी हुई थीं। उनमें बहुत-से कमल खिले रहते थे। वहाँ अनेकों किम्पुरुष जी बहलानेके लिये आये हुए थे। इस प्रकार उस वनकी शोभा निहारते जब देवगण कुछ आगे बढ़े, तब उन्हें पास ही एक वटवृक्ष दिखलायी दिया॥ ३१॥
वैदूर्यकृतसोपाना वाप्य उत्पलमालिनीः।
प्राप्तं किम्पुरुषैर्दृष्ट्वा त आराद्ददृशुर्वटम्॥ ३१
बावलियोंकी सीढ़ियाँ वैदूर्य-मणिकी बनी हुई थीं। उनमें बहुत-से कमल खिले रहते थे। वहाँ अनेकों किम्पुरुष जी बहलानेके लिये आये हुए थे। इस प्रकार उस वनकी शोभा निहारते जब देवगण कुछ आगे बढ़े, तब उन्हें पास ही एक वटवृक्ष दिखलायी दिया॥ ३१॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.6.31 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 431) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/6/31/