मंगलमय महेश्वर! आप शुभ कर्म करनेवालोंको स्वर्गलोक अथवा मोक्षपद प्रदान करते हैं तथा पापकर्म करनेवालोंको घोर नरकोंमें डालते हैं। फिर भी किसी-किसी व्यक्तिके लिये इन कर्मोंका फल उलटा कैसे हो जाता है?॥ ४५॥
त्वं कर्मणां मंगल मंगलानां
कर्तुः स्म लोकं तनुषे स्वः परं वा।
अमंगलानां च तमिस्रमुल्बणं
विपर्ययः केन तदेव कस्यचित्॥ ४५
मंगलमय महेश्वर! आप शुभ कर्म करनेवालोंको स्वर्गलोक अथवा मोक्षपद प्रदान करते हैं तथा पापकर्म करनेवालोंको घोर नरकोंमें डालते हैं। फिर भी किसी-किसी व्यक्तिके लिये इन कर्मोंका फल उलटा कैसे हो जाता है?॥ ४५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.6.45 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 432) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/6/45/