रुद्रदेव! अस्त्र-शस्त्र और पत्थरोंकी बौछारसे जिन देवता और ऋत्विजोंके अंग-प्रत्यंग घायल हो गये हैं, आपकी कृपासे वे फिर ठीक हो जायँ॥ ५२॥
देवानां भग्नगात्राणामृत्विजां चायुधाश्मभिः।
भवतानुगृहीतानामाशु मन्योऽस्त्वनातुरम्॥ ५२
रुद्रदेव! अस्त्र-शस्त्र और पत्थरोंकी बौछारसे जिन देवता और ऋत्विजोंके अंग-प्रत्यंग घायल हो गये हैं, आपकी कृपासे वे फिर ठीक हो जायँ॥ ५२॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.6.52 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 433) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/6/52/