तब ब्राह्मणोंने यज्ञ सम्पन्न करनेके उद्देश्यसे रुद्रगण-सम्बन्धी भूत-पिशाचोंके संसर्गजनित दोषकी शान्तिके लिये तीन पात्रोंमें विष्णुभगवान्के लिये तैयार किये हुए पुरोडाश नामक चरुका हवन किया॥ १७॥✎ 362
वैष्णवं यज्ञसन्तत्यै त्रिकपालं द्विजोत्तमाः।
पुरोडाशं निरवपन् वीरसंसर्गशुद्धये॥ १७
तब ब्राह्मणोंने यज्ञ सम्पन्न करनेके उद्देश्यसे रुद्रगण-सम्बन्धी भूत-पिशाचोंके संसर्गजनित दोषकी शान्तिके लिये तीन पात्रोंमें विष्णुभगवान्के लिये तैयार किये हुए पुरोडाश नामक चरुका हवन किया॥ १७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.7.17 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 435) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/7/17/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)