श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.7.17

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 7 · अथ सप्तमोऽध्यायः

वैष्णवं यज्ञसन्तत्यै त्रिकपालं द्विजोत्तमाः।

पुरोडाशं निरवपन् वीरसंसर्गशुद्धये॥ १७

vaiṣṇavaṃ yajñasantatyai trikapālaṃ dvijottamāḥ|

puroḍāśaṃ niravapan vīrasaṃsargaśuddhaye|| 17

अर्थ

तब ब्राह्मणोंने यज्ञ सम्पन्‍न करनेके उद्देश्यसे रुद्रगण-सम्बन्धी भूत-पिशाचोंके संसर्गजनित दोषकी शान्तिके लिये तीन पात्रोंमें विष्णुभगवान्‌के लिये तैयार किये हुए पुरोडाश नामक चरुका हवन किया॥ १७॥✎ 362

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #362 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने

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