श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.7.2

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 7 · अथ सप्तमोऽध्यायः

श्रीमहादेव उवाच

नाघं प्रजे१श बालानां वर्णये नानुचिन्तये।

देवमायाभिभूतानां दण्डस्तत्र२ धृतो मया॥ २

nāghaṃ prajeśa bālānāṃ varṇaye nānucintaye|

devamāyābhibhūtānāṃ daṇḍastatra dhṛto mayā|| 2

अर्थ

श्रीमहादेवजीने कहा—‘प्रजापते! भगवान्‌की मायासे मोहित हुए दक्ष-जैसे नासमझोंके अपराधकी न तो मैं चर्चा करता हूँ और न याद ही। मैंने तो केवल सावधान करनेके लिये ही उन्हें थोड़ा-सा दण्ड दे दिया॥ २॥✎ 361

टिप्पणियाँ

  1. १

    प्रा० पा०—परेश।

    (मुद्रित पृष्ठ 434)
  2. २

    प्रा० पा०—दण्डस्तु विधृतो।

    (मुद्रित पृष्ठ 434)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #361 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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