ब्रह्मस्वरूप वेदने कहा—आप ही धर्मादिकी उत्पत्तिके लिये शुद्ध सत्त्वको स्वीकार करते हैं, साथ ही आप निर्गुण भी हैं। अतएव आपका तत्त्व न तो मैं जानता हूँ और न ब्रह्मादि कोई और ही जानते हैं; आपको नमस्कार है॥ ४०॥
नमस्ते श्रितसत्त्वाय धर्मादीनां च सूतये।
निर्गुणाय च यत्काष्ठां नाहं वेदापरेऽपि च॥ ४०
ब्रह्मस्वरूप वेदने कहा—आप ही धर्मादिकी उत्पत्तिके लिये शुद्ध सत्त्वको स्वीकार करते हैं, साथ ही आप निर्गुण भी हैं। अतएव आपका तत्त्व न तो मैं जानता हूँ और न ब्रह्मादि कोई और ही जानते हैं; आपको नमस्कार है॥ ४०॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.7.40 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 439) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/7/40/