श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.7.8

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 7 · अथ सप्तमोऽध्यायः

विधाय कार्त्स्न्येन च तद्यदाह भगवान् भवः।

संदधुः कस्य कायेन सवनीयपशोः शिरः॥ ८

vidhāya kārtsnyena ca tadyadāha bhagavān bhavaḥ|

saṃdadhuḥ kasya kāyena savanīyapaśoḥ śiraḥ|| 8

अर्थ

वहाँ जैसा-जैसा भगवान् शंकरने कहा था, उसी प्रकार सब कार्य करके उन्होंने दक्षकी धड़से यज्ञपशुका सिर जोड़ दिया॥ ८॥

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