श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.8.2

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 8 · अथाष्टमोऽध्यायः

मृषाधर्मस्य भार्याऽऽसीद्दम्भं मायां च शत्रुहन्।

असूत मिथुनं तत्तु निर्ऋतिर्जगृहेऽप्रजः॥ २✎ 1025 1026

mṛṣādharmasya bhāryā''sīddambhaṃ māyāṃ ca śatruhan|

asūta mithunaṃ tattu nir:ṛtirjagṛhe'prajaḥ|| 2

अर्थ

श्रीमैत्रेयजी कहते हैं—शत्रुसूदन विदुरजी! सनकादि, नारद, ऋभु, हंस, अरुणि और यति—ब्रह्माजीके इन नैष्ठिक ब्रह्मचारी पुत्रोंने गृहस्थाश्रममें प्रवेश नहीं किया (अतः उनके कोई सन्तान नहीं हुई)। अधर्म भी ब्रह्माजीका ही पुत्र था, उसकी पत्नीका नाम था मृषा। उसके दम्भ नामक पुत्र और माया नामकी कन्या हुई। उन दोनोंको निर्ऋति ले गया, क्योंकि उसके कोई सन्तान न थी॥ १-२॥✎ 1321 1322

यह अर्थ श्लोक 1–2 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (4)
  • #1025 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): निऋर्तिर्जगृहेऽप्रज:॥ → निऋर्ऋतिर्जगृहेऽप्रजः॥
  • #1026 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): निऋर्ऋतिर्जगृहेऽप्रज:॥ → निर्ऋतिर्जगृहेऽप्रजः॥
  • #1321 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): निऋर्ति → निऋर्ऋति
  • #1322 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): निऋर्ऋति → निर्ऋति

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