विधाताके विधानके अनुसार सुख-दुःख जो कुछ भी प्राप्त हो, उसीमें चित्तको सन्तुष्ट रखना चाहिये। यों करनेवाला पुरुष मोहमय संसारसे पार हो जाता है॥ ३३॥✎ 367368
यस्य यद् दैवविहितं स तेन सुखदुःखयोः।
आत्मानं तोषयन्देही तमसः पारमृच्छति॥ ३३
विधाताके विधानके अनुसार सुख-दुःख जो कुछ भी प्राप्त हो, उसीमें चित्तको सन्तुष्ट रखना चाहिये। यों करनेवाला पुरुष मोहमय संसारसे पार हो जाता है॥ ३३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.8.33 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 446) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/8/33/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)