ध्रुवने कहा—भगवन्! सुख-दुःखसे जिनका चित्त चंचल हो जाता है, उन लोगोंके लिये आपने कृपा करके शान्तिका यह बहुत अच्छा उपाय बतलाया। परन्तु मुझ-जैसे अज्ञानियोंकी दृष्टि यहाँतक नहीं पहुँच पाती॥ ३५॥
सोऽयं शमो भगवता सुखदुःखहतात्मनाम्।
दर्शितः कृपया पुंसां दुर्दर्शोऽस्मद्विधैस्तु यः॥ ३५
ध्रुवने कहा—भगवन्! सुख-दुःखसे जिनका चित्त चंचल हो जाता है, उन लोगोंके लिये आपने कृपा करके शान्तिका यह बहुत अच्छा उपाय बतलाया। परन्तु मुझ-जैसे अज्ञानियोंकी दृष्टि यहाँतक नहीं पहुँच पाती॥ ३५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.8.35 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 446) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/8/35/