॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 4.9.12
ते न स्मरन्त्यतितरां प्रियमीश मर्त्यं
ये चान्वदः सुतसुहृद्गृहवित्तदाराः।
ये त्वब्जनाभ भवदीयपदारविन्द-
सौगन्ध्यलुब्धहृदयेषु कृतप्रसंगाः॥ १२
te na smarantyatitarāṃ priyamīśa martyaṃ
ye cānvadaḥ sutasuhṛdgṛhavittadārāḥ|
ye tvabjanābha bhavadīyapadāravinda-
saugandhyalubdhahṛdayeṣu kṛtaprasaṃgāḥ|| 12
अर्थ
कमलनाभ प्रभो! जिनका चित्त आपके चरणकमलकी सुगन्धमें लुभाया हुआ है, उन महानुभावोंका जो लोग संग करते हैं—वे अपने इस अत्यन्त प्रिय शरीर और इसके सम्बन्धी पुत्र, मित्र, गृह और स्त्री आदिकी सुधि भी नहीं करते॥ १२॥