॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 4.9.14
कल्पान्त१ एतदखिलं जठरेण गृह्णन्
शेते पुमान् स्वदृगनन्तसखस्तदङ्के।
यन्नाभिसिन्धुरुहकांचनलोकपद्म-
गर्भे द्युमान् भगवते प्रणतोऽस्मि तस्मै॥ १४
kalpānta etadakhilaṃ jaṭhareṇa gṛhṇan
śete pumān svadṛganantasakhastadaṅke|
yannābhisindhuruhakāṃcanalokapadma-
garbhe dyumān bhagavate praṇato'smi tasmai|| 14
अर्थ
भगवन्! कल्पका अन्त होनेपर योगनिद्रामें स्थित जो परमपुरुष इस सम्पूर्ण विश्वको अपने उदरमें लीन करके शेषजीके साथ उन्हींकी गोदमें शयन करते हैं तथा जिनके नाभि-समुद्रसे प्रकट हुए सर्वलोकमय सुवर्णवर्ण कमलसे परम तेजोमय ब्रह्माजी उत्पन्न हुए, वे भगवान् आप ही हैं, मैं आपको प्रणाम करता हूँ॥ १४॥
टिप्पणियाँ
- १
प्रा० पा०—न्तरे तदखि०।