श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.9.27

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 9 · अथ नवमोऽध्यायः

सोऽपि संकल्पजं विष्णोः पादसेवोपसादितम्।

प्राप्य संकल्पनिर्वाणं नातिप्रीतोऽभ्यगात्पुरम्॥ २७

so'pi saṃkalpajaṃ viṣṇoḥ pādasevopasāditam|

prāpya saṃkalpanirvāṇaṃ nātiprīto'bhyagātpuram|| 27

अर्थ

प्रभुकी चरणसेवासे संकल्पित वस्तु प्राप्त हो जानेके कारण यद्यपि ध्रुवजीका संकल्प तो निवृत्त हो गया, किन्तु उनका चित्त विशेष प्रसन्‍न नहीं हुआ। फिर वे अपने नगरको लौट गये॥ २७॥

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