श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.9.3

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 9 · अथ नवमोऽध्यायः

तद्दर्शनेनागतसाध्वसः क्षिता-

ववन्दताङ्गं विनमय्य दण्डवत्।

दृग्भ्यां प्रपश्यन् प्रपिबन्‍निवार्भक-

श्चुम्बन्‍निवास्येन भुजैरिवाश्लिषन्॥ ३

taddarśanenāgatasādhvasaḥ kṣitā-

vavandatāṅgaṃ vinamayya daṇḍavat|

dṛgbhyāṃ prapaśyan prapibannivārbhaka-

ścumbannivāsyena bhujairivāśliṣan|| 3

अर्थ

प्रभुका दर्शन पाकर बालक ध्रुवको बड़ा कुतूहल हुआ, वे प्रेममें अधीर हो गये। उन्होंने पृथ्वीपर दण्डके समान लोटकर उन्हें प्रणाम किया। फिर वे इस प्रकार प्रेमभरी दृष्टिसे उनकी ओर देखने लगे मानो नेत्रोंसे उन्हें पी जायँगे, मुखसे चूम लेंगे और भुजाओंमें कस लेंगे॥ ३॥✎ 374

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #374 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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