श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.9.59

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 9 · अथ नवमोऽध्यायः

उपजह्रुः प्रयुंजाना वात्सल्यादाशिषः सतीः।✎ 1028

शृण्वंस्तद्वल्गुगीतानि प्राविशद्भवनं पितुः॥ ५९

upajahruḥ prayuṃjānā vātsalyādāśiṣaḥ satīḥ|

śṛṇvaṃstadvalgugītāni prāviśadbhavanaṃ pituḥ|| 59

अर्थ

ध्रुवजी राजमार्गसे जा रहे थे। उस समय जहाँ-तहाँ नगरकी शीलवती सुन्दरियाँ उन्हें देखनेको एकत्र हो रही थीं। उन्होंने वात्सल्यभावसे अनेकों शुभाशीर्वाद देते हुए उनपर सफेद सरसों, अक्षत, दही, जल, दूर्वा, पुष्प और फलोंकी वर्षा की। इस प्रकार उनके मनोहर गीत सुनते हुए ध्रुवजीने अपने पिताके महलमें प्रवेश किया॥ ५८-५९॥

यह अर्थ श्लोक 58–59 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1028 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): उपजहृ: → उपजह्रुः

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