श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.9.7

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 9 · अथ नवमोऽध्यायः

एकस्त्वमेव भगवन्‍निदमात्मशक्‍त्या

मायाख्ययोरुगुणया महदाद्यशेषम्।

सृष्ट्वानुविश्य पुरुषस्तदसद‍्गुणेषु।

नानेव दारुषु विभावसुवद्विभासि॥ ७

ekastvameva bhagavannidamātmaśaktyā

māyākhyayoruguṇayā mahadādyaśeṣam|

sṛṣṭvānuviśya puruṣastadasadguṇeṣu|

nāneva dāruṣu vibhāvasuvadvibhāsi|| 7

अर्थ

भगवन्! आप एक ही हैं, परन्तु अपनी अनन्त गुणमयी मायाशक्तिसे इस महदादि सम्पूर्ण प्रपंचको रचकर अन्तर्यामीरूपसे उसमें प्रवेश कर जाते हैं और फिर इसके इन्द्रियादि असत् गुणोंमें उनके अधिष्ठातृ-देवताओंके रूपमें स्थित होकर अनेकरूप भासते हैं—ठीक वैसे ही जैसे तरह-तरहकी लकड़ियोंमें प्रकट हुई आग अपनी उपाधियोंके अनुसार भिन्‍न-भिन्‍न रूपोंमें भासती है॥ ७॥

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