श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.11.6

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 11 · अथैकादशोऽध्यायः

दुःखं सुखं व्यतिरिक्तं च तीव्रं

कालोपपन्‍नं फलमाव्यनक्ति।

आलिङ्‌ग्‍य मायारचितान्तरात्मा

स्वदेहिनं संसृतिचक्रकूटः॥ ६

duḥkhaṃ sukhaṃ vyatiriktaṃ ca tīvraṃ

kālopapannaṃ phalamāvyanakti|

āliṅgya māyāracitāntarātmā

svadehinaṃ saṃsṛticakrakūṭaḥ|| 6

अर्थ

यह मायामय मन संसारचक्रमें छलनेवाला है, यही अपनी देहके अभिमानी जीवसे मिलकर उसे कालक्रमसे प्राप्त हुए सुख-दुःख और इनसे व्यतिरिक्त मोहरूप अवश्यम्भावी फलोंकी अभिव्यक्ति करता है॥ ६॥

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें