श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.11.7

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 11 · अथैकादशोऽध्यायः

तावानयं व्यवहारः सदाविः

क्षेत्रज्ञसाक्ष्यो भवति स्थूलसूक्ष्मः।

तस्मान्मनो लिङ्गमदो वदन्ति

गुणागुणत्वस्य परावरस्य॥ ७

tāvānayaṃ vyavahāraḥ sadāviḥ

kṣetrajñasākṣyo bhavati sthūlasūkṣmaḥ|

tasmānmano liṅgamado vadanti

guṇāguṇatvasya parāvarasya|| 7

अर्थ

जबतक यह मन रहता है, तभीतक जाग्रत् और स्वप्नावस्थाका व्यवहार प्रकाशित होकर जीवका दृश्य बनता है। इसलिये पण्डितजन मनको ही त्रिगुणमय अधम संसारका और गुणातीत परमोत्कृष्ट मोक्षपदका कारण बताते हैं॥ ७॥

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