श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.12.11

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 12 · अथ द्वादशोऽध्यायः

ज्ञानं विशुद्धं परमार्थमेक-

मनन्तरं त्वबहिर्ब्रह्म सत्यम्।

प्रत्यक् प्रशान्तं भगवच्छब्दसंज्ञं

यद्वासुदेवं कवयो वदन्ति॥ ११

jñānaṃ viśuddhaṃ paramārthameka-

manantaraṃ tvabahirbrahma satyam|

pratyak praśāntaṃ bhagavacchabdasaṃjñaṃ

yadvāsudevaṃ kavayo vadanti|| 11

अर्थ

विशुद्ध परमार्थरूप, अद्वितीय तथा भीतर-बाहरके भेदसे रहित परिपूर्ण ज्ञान ही सत्य वस्तु है। वह सर्वान्तर्वर्ती और सर्वथा निर्विकार है। उसीका नाम ‘भगवान्’ है और उसीको पण्डितजन ‘वासुदेव’ कहते हैं॥ ११॥

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