श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.12.10

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 12 · अथ द्वादशोऽध्यायः

एवं कृशं स्थूलमणुर्बृहद्यद्

असच्च सज्जीवमजीवमन्यत्।

द्रव्यस्वभावाशयकालकर्म

नाम्नाजयावेहि कृतं द्वितीयम्॥ १०

evaṃ kṛśaṃ sthūlamaṇurbṛhadyad

asacca sajjīvamajīvamanyat|

dravyasvabhāvāśayakālakarma

nāmnājayāvehi kṛtaṃ dvitīyam|| 10

अर्थ

इसी प्रकार और भी जो कुछ पतला-मोटा, छोटा-बड़ा, कार्य-कारण तथा चेतन और अचेतन आदि गुणोंसे युक्त द्वैत-प्रपंच है—उसे भी द्रव्य, स्वभाव, आशय, काल और कर्म आदि नामोंवाली भगवान्‌की मायाका ही कार्य समझो॥ १०॥✎ 448

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #448 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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