श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.12.16

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 12 · अथ द्वादशोऽध्यायः

तस्मान्‍नरोऽसङ्गसुसङ्गजात-

ज्ञानासिनेहैव विवृक्णमोहः।

हरिं तदीहाकथनश्रुताभ्यां

लब्धस्मृतिर्यात्यतिपारमध्वनः ॥ १६

tasmānnaro'saṅgasusaṅgajāta-

jñānāsinehaiva vivṛkṇamohaḥ|

hariṃ tadīhākathanaśrutābhyāṃ

labdhasmṛtiryātyatipāramadhvanaḥ || 16

अर्थ

सारांश यह है कि विरक्त महापुरुषोंके सत्संगसे प्राप्त ज्ञानरूप खड्गके द्वारा मनुष्यको इस लोकमें ही अपने मोहबन्धनको काट डालना चाहिये। फिर श्रीहरिकी लीलाओंके कथन और श्रवणसे भगवत्स्मृति बनी रहनेके कारण वह सुगमतासे ही संसारमार्गको पार करके भगवान्‌को प्राप्त कर सकता है॥ १६॥✎ 449 450

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां पञ्चमस्कन्धे
ब्राह्मणरहूगणसंवादे द्वादशोऽध्यायः
॥ १२॥

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #449 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् को → भगवान्‌को
  • #450 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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