॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 5.13.1
अथ त्रयोदशोऽध्यायः
भवाटवीका वर्णन और रहूगणका संशयनाश
ब्राह्मण उवाच
दुरत्ययेऽध्वन्यजया निवेशितो
रजस्तमःसत्त्वविभक्तकर्मदृक् ।
स एष सार्थोऽर्थपरः परिभ्रमन्
भवाटवीं याति न शर्म विन्दति॥ १
duratyaye'dhvanyajayā niveśito
rajastamaḥsattvavibhaktakarmadṛk |
sa eṣa sārtho'rthaparaḥ paribhraman
bhavāṭavīṃ yāti na śarma vindati|| 1
अर्थ
जडभरतने कहा—राजन्! यह जीवसमूह सुखरूप धनमें आसक्त देश-देशान्तरमें घूम-फिरकर व्यापार करनेवाले व्यापारियोंके दलके समान है। इसे मायाने दुस्तर प्रवृत्तिमार्गमें लगा दिया है; इसलिये इसकी दृष्टि सात्त्विक, राजस, तामस भेदसे नाना प्रकारके कर्मोंपर ही जाती है। उन कर्मोंमें भटकता-भटकता यह संसाररूप जंगलमें पहुँच जाता है। वहाँ इसे तनिक भी शान्ति नहीं मिलती॥ १॥