श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.13.12

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 13 · अथ त्रयोदशोऽध्यायः

क्‍वचित्क्वचित्क्षीणधनस्तु तस्मिन्

शय्यासनस्थानविहारहीनः ।

याचन् परादप्रतिलब्धकामः

पारक्यदृष्टिर्लभतेऽवमानम् ॥ १२

kvacitkvacitkṣīṇadhanastu tasmin

śayyāsanasthānavihārahīnaḥ |

yācan parādapratilabdhakāmaḥ

pārakyadṛṣṭirlabhate'vamānam || 12

अर्थ

कभी-कभी उस संसारवनमें इसका धन नष्ट हो जाता है तो इसके पास शय्या, आसन, रहनेके लिये स्थान और सैर-सपाटेके लिये सवारी आदि भी नहीं रहते। तब दूसरोंसे याचना करता है; माँगनेपर भी दूसरेसे जब उसे अभिलषित वस्तु नहीं मिलती, तब परायी वस्तुओंपर अनुचित दृष्टि रखनेके कारण इसे बड़ा तिरस्कार सहना पड़ता है॥ १२॥

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