॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 5.13.19
अतः कथञ्चित्स विमुक्त आपदः ✎ 1054
पुनश्च सार्थं प्रविशत्यरिन्दम।
अध्वन्यमुष्मिन्नजया२ निवेशितो
भ्रमञ्जनोऽद्यापि न वेद कश्चन॥ १९
ataḥ kathañcitsa vimukta āpadaḥ
punaśca sārthaṃ praviśatyarindama|
adhvanyamuṣminnajayā niveśito
bhramañjano'dyāpi na veda kaścana|| 19
अर्थ
शत्रुदमन! यदि किसी प्रकार इसे उस आपत्तिसे छुटकारा मिल जाता है, तो यह फिर अपने गोलमें मिल जाता है। जो मनुष्य मायाकी प्रेरणासे एक बार इस मार्गमें पहुँच जाता है, उसे भटकते-भटकते अन्ततक अपने परम पुरुषार्थका पता नहीं लगता॥ १९॥
टिप्पणियाँ
- २
प्रा० पा०—मुष्मिन्नंजसा।