श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.13.20

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 13 · अथ त्रयोदशोऽध्यायः

रहूगण त्वमपि ह्यध्वनोऽस्य

संन्यस्तदण्डः कृतभूतमैत्रः।

असज्जितात्मा हरिसेवया शितं

ज्ञानासिमादाय तरातिपारम्॥ २०

rahūgaṇa tvamapi hyadhvano'sya

saṃnyastadaṇḍaḥ kṛtabhūtamaitraḥ|

asajjitātmā harisevayā śitaṃ

jñānāsimādāya tarātipāram|| 20

अर्थ

रहूगण! तुम भी इसी मार्गमें भटक रहे हो, इसलिये अब प्रजाको दण्ड देनेका कार्य छोड़कर समस्त प्राणियोंके सुहृद‍् हो जाओ और विषयोंमें अनासक्त होकर भगवत्सेवासे तीक्ष्ण किया हुआ ज्ञानरूप खड्ग लेकर इस मार्गको पार कर लो॥ २०॥

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