श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.13.21

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 13 · अथ त्रयोदशोऽध्यायः

राजोवाच

अहो नृजन्माखिलजन्मशोभनं

किं जन्मभिस्त्वपरैरप्यमुष्मिन्।

न यद‍्धृषीकेशयशःकृतात्मनां

महात्मनां वः प्रचुरः समागमः॥ २१

aho nṛjanmākhilajanmaśobhanaṃ

kiṃ janmabhistvaparairapyamuṣmin|

na yaddhṛṣīkeśayaśaḥkṛtātmanāṃ

mahātmanāṃ vaḥ pracuraḥ samāgamaḥ|| 21

अर्थ

राजा रहूगणने कहा—अहो! समस्त योनियोंमें यह मनुष्यजन्म ही श्रेष्ठ है। अन्यान्य लोकोंमें प्राप्त होनेवाले देवादि उत्कृष्ट जन्मोंसे भी क्या लाभ है, जहाँ भगवान् हृषीकेशके पवित्र यशसे शुद्ध अन्तःकरणवाले आप-जैसे महात्माओंका अधिकाधिक समागम नहीं मिलता॥ २१॥

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