इत्येवमुत्तरामातः स वै ब्रह्मर्षिसुतः सिन्धुपतय आत्मसतत्त्वं१ विगणयतः परानुभावः परमकारुणिकतयोपदिश्य रहूगणेन सकरुणमभिवन्दितचरण आपूर्णार्णव२ इव निभृतकरणोर्म्याशयो धरणिमिमां विचचार३॥ २४॥ सौवीरपतिरपि सुजनसमवगतपरमात्मसतत्त्व आत्मन्यविद्याध्यारोपितां च देहात्ममतिं विससर्ज। एवं हि नृप भगवदाश्रिताश्रितानुभावः४॥ २५॥✎ 1867
sauvīrapatirapi sujanasamavagataparamātmasatattva ātmanyavidyādhyāropitāṃ ca dehātmamatiṃ visasarja| evaṃ hi nṛpa bhagavadāśritāśritānubhāvaḥ|| 25||
अर्थ
उनके सत्संगसे परमात्मतत्त्वका ज्ञान पाकर सौवीरपति रहूगणने भी अन्तःकरणमें अविद्यावश आरोपित देहात्मबुद्धिको त्याग दिया। राजन्! जो लोग भगवदाश्रित अनन्य भक्तोंकी शरण ले लेते हैं, उनका ऐसा ही प्रभाव होता है—उनके पास अविद्या ठहर नहीं सकती॥ २५॥
सौवीरपतिरपि सुजनसमवगतपरमात्मसतत्त्व आत्मन्यविद्याध्यारोपितां च देहात्ममतिं विससर्ज। एवं हि नृप भगवदाश्रिताश्रितानुभावः॥ २५॥
उनके सत्संगसे परमात्मतत्त्वका ज्ञान पाकर सौवीरपति रहूगणने भी अन्तःकरणमें अविद्यावश आरोपित देहात्मबुद्धिको त्याग दिया। राजन्! जो लोग भगवदाश्रित अनन्य भक्तोंकी शरण ले लेते हैं, उनका ऐसा ही प्रभाव होता है—उनके पास अविद्या ठहर नहीं सकती॥ २५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 5.13.25 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 629) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/5/13/25/
टिप्पणियाँ
१
प्रा० पा०—आत्मस्वतत्त्वं।
(मुद्रित पृष्ठ 629)
२
प्रा० पा०—चरणः पूर्णार्णव इव।
(मुद्रित पृष्ठ 629)
३
प्रा० पा०—मिमां चचार।
(मुद्रित पृष्ठ 629)
४
प्रा० पा०—भगवदाश्रितानुभावः।
(मुद्रित पृष्ठ 629)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#1867 अक्षर (एक स्थानपर, प्रमाणसहित): णयत:परानु → णयतः परानु