श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.13.26

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 13 · अथ त्रयोदशोऽध्यायः

राजोवाच

यो ह वा इह बहुविदा महाभागवत त्वयाभिहितः परोक्षेण वचसा जीवलोकभवाध्वा स ह्यार्यमनीषया कल्पितविषयो नाञ्जसाव्युत्पन्‍नलोकसमधिगमः। अथ तदेवैतद्दुरवगमं समवेतानुकल्पेन निर्दिश्यतामिति॥ २६॥✎ 1868

yo ha vā iha bahuvidā mahābhāgavata tvayābhihitaḥ parokṣeṇa vacasā jīvalokabhavādhvā sa hyāryamanīṣayā kalpitaviṣayo nāñjasāvyutpannalokasamadhigamaḥ| atha tadevaitadduravagamaṃ samavetānukalpena nirdiśyatāmiti|| 26||

अर्थ

राजा परीक्षित‍्ने कहा—महाभागवत मुनिश्रेष्ठ! आप परम विद्वान् हैं। आपने रूपकादिके द्वारा अप्रत्यक्षरूपसे जीवोंके जिस संसाररूप मार्गका वर्णन किया है, उस विषयकी कल्पना विवेकी पुरुषोंकी बुद्धिने की है; वह अल्पबुद्धिवाले पुरुषोंकी समझमें सुगमतासे नहीं आ सकता। अतः मेरी प्रार्थना है कि इस दुर्बोध विषयको रूपकका स्पष्टीकरण करनेवाले शब्दोंसे खोलकर समझाइये॥ २६॥

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां पञ्चमस्कन्धे त्रयोदशोऽध्यायः॥ १३॥

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1868 अक्षर (एक स्थानपर, प्रमाणसहित): वचसाजीव → वचसा जीव

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