श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.13.3

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 13 · अथ त्रयोदशोऽध्यायः

प्रभूतवीरुत्तृणगुल्मगह्वरे

कठोरदंशैर्मशकैरुपद्रुतः ।

क्‍वचित्तु गन्धर्वपुरं प्रपश्यति

क्‍वचित्‍क्‍वचिच्चाशुरयोल्मुकग्रहम्॥ ३

prabhūtavīruttṛṇagulmagahvare

kaṭhoradaṃśairmaśakairupadrutaḥ |

kvacittu gandharvapuraṃ prapaśyati

kvacitkvaciccāśurayolmukagraham|| 3

अर्थ

वह जंगल बहुत-सी लता, घास और झाड़-झंखाड़के कारण बहुत दुर्गम हो रहा है। उसमें तीव्र डाँस और मच्छर इसे चैन नहीं लेने देते। वहाँ इसे कभी तो गन्धर्वनगर दीखने लगता है और कभी-कभी चमचमाता हुआ अति चंचल अगिया-बेताल आँखोंके सामने आ जाता है॥ ३॥

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