॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 5.13.4
निवासतोयद्रविणात्मबुद्धि-
स्ततस्ततो धावति भो अटव्याम्।
क्वचिच्च वात्योत्थितपांसुधूम्रा
दिशो न जानाति रजस्वलाक्षः॥ ४
nivāsatoyadraviṇātmabuddhi-
statastato dhāvati bho aṭavyām|
kvacicca vātyotthitapāṃsudhūmrā
diśo na jānāti rajasvalākṣaḥ|| 4
अर्थ
यह वणिक्-समुदाय इस वनमें निवासस्थान, जल और धनादिमें आसक्त होकर इधर-उधर भटकता रहता है। कभी बवंडरसे उठी हुई धूलके द्वारा जब सारी दिशाएँ धूमाच्छादित-सी हो जाती हैं और इसकी आँखोंमें भी धूल भर जाती है, तो इसे दिशाओंका ज्ञान भी नहीं रहता॥ ४॥