श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.13.8

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 13 · अथ त्रयोदशोऽध्यायः

चलन् क्‍वचित्कण्टकशर्कराङ्‌घ्रि-

र्नगारुरुक्षुर्विमना इवास्ते।

पदे पदेऽभ्यन्तरवह्निनार्दितः

कौटुम्बिकः क्रुध्यति वै जनाय॥ ८

calan kvacitkaṇṭakaśarkarāṅghri-

rnagārurukṣurvimanā ivāste|

pade pade'bhyantaravahninārditaḥ

kauṭumbikaḥ krudhyati vai janāya|| 8

अर्थ

कभी पर्वतोंपर चढ़ना चाहता है तो काँटे और कंकड़ोंद्वारा पैर चलनी हो जानेसे उदास हो जाता है। कुटुम्ब बहुत बढ़ जाता है और उदरपूर्तिका साधन नहीं होता तो भूखकी ज्वालासे सन्तप्त होकर अपने ही बन्धु-बान्धवोंपर खीझने लगता है॥ ८॥

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