श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.13.9

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 13 · अथ त्रयोदशोऽध्यायः

क्‍वचिन्‍निगीर्णोऽजगराहिना जनो

नावैति किञ्चिद्विपिनेऽपविद्धः।

दष्टः स्म शेते क्‍व च दन्दशूकै-

रन्धोऽन्धकूपे पतितस्तमिस्रे॥ ९

kvacinnigīrṇo'jagarāhinā jano

nāvaiti kiñcidvipine'paviddhaḥ|

daṣṭaḥ sma śete kva ca dandaśūkai-

randho'ndhakūpe patitastamisre|| 9

अर्थ

कभी अजगर सर्पका ग्रास बनकर वनमें फेंके हुए मुर्देके समान पड़ा रहता है। उस समय इसे कोई सुध-बुध नहीं रहती। कभी दूसरे विषैले जन्तु इसे काटने लगते हैं तो उनके विषके प्रभावसे अंधा होकर किसी अंधे कुएँमें गिर पड़ता है और घोर दुःखमय अन्धकारमें बेहोश पड़ा रहता है॥ ९॥

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