श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.14.2

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 14 · अथ चतुर्दशोऽध्यायः

तद्यथा पुरुषस्य धनं यत्किञ्चिद्धर्मौपयिकं१ बहुकृच्छ्राधिगतं साक्षात्परमपुरुषाराधनलक्षणो२ योऽसौ धर्मस्तं तु साम्पराय उदाहरन्ति। तद्धर्म्यं धनं द३र्शनस्पर्शनश्रवणास्वादनावघ्राणसङ्कल्पव्यवसायगृहग्राम्योपभोगेन कुनाथस्य अजितात्मनो यथा सार्थस्य४ विलुम्पन्ति॥ २॥ अथ च यत्र कौटुम्बिका दारापत्यादयो नाम्ना कर्मणा वृकसृगाला एवानिच्छतोऽपि कदर्यस्य कुटुम्बिन उरणकवत्संरक्ष्यमाणं मिषतोऽपि५ हरन्ति॥ ३॥ यथा ह्यनुवत्सरं कृष्यमाणमप्यदग्धबीजं क्षेत्रं पुनरेवावपनकाले गुल्मतृणवीरुद्भिर्गह्वरमिव भवत्येवमेव गृहाश्रमः कर्मक्षेत्रं यस्मिन्‍न हि कर्माण्युत्सीदन्ति यदयं कामकरण्ड एष आवसथः॥ ४॥✎ 941

tadyathā puruṣasya dhanaṃ yatkiñciddharmaupayikaṃ bahukṛcchrādhigataṃ sākṣātparamapuruṣārādhanalakṣaṇo yo'sau dharmastaṃ tu sāmparāya udāharanti| taddharmyaṃ dhanaṃ darśanasparśanaśravaṇāsvādanāvaghrāṇasaṅkalpavyavasāyagṛhagrāmyopabhogena kunāthasya ajitātmano yathā sārthasya vilumpanti|| 2||

अर्थ

पुरुष बहुत-सा कष्ट उठाकर जो धन कमाता है, उसका उपयोग धर्ममें होना चाहिये; वही धर्म यदि साक्षात् भगवान् परमपुरुषकी आराधनाके रूपमें होता है तो उसे परलोकमें निःश्रेयसका हेतु बतलाया गया है। किन्तु जिस मनुष्यका बुद्धिरूप सारथि विवेकहीन होता है और मन वशमें नहीं होता, उसके उस धर्मोपयोगी धनको ये मनसहित छः इन्द्रियाँ देखना, स्पर्श करना, सुनना, स्वाद लेना, सूँघना, संकल्प-विकल्प करना और निश्‍चय करना—इन वृत्तियोंके द्वारा गृहस्थोचित विषयभोगोंमें फँसाकर उसी प्रकार लूट लेती हैं, जिस प्रकार बेईमान मुखियाका अनुगमन करनेवाले एवं असावधान बनिजारोंके दलका धन चोर-डाकू लूट ले जाते हैं॥ २॥

टिप्पणियाँ

  1. १

    प्रा० पा०—यत्किंचित्साक्षाद्धर्मौप।

    (मुद्रित पृष्ठ 631)
  2. २

    प्रा० पा०—यत् परमपुरुषा०।

    (मुद्रित पृष्ठ 631)
  3. ३

    प्रा० पा०—दर्शनस्वादनावघ्राणसङ्कल्प-संव्यवसाय०।

    (मुद्रित पृष्ठ 631)
  4. ४

    प्रा० पा०—यथा सार्थिकस्य त०।

    (मुद्रित पृष्ठ 631)
  5. ५

    प्रा० पा०—निमिषतो०।

    (मुद्रित पृष्ठ 631)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #941 शब्दोंके बीचका स्थान: मिषतोऽपिहरन्ति॥ → मिषतोऽपि हरन्ति॥

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