श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.14.3

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 14 · अथ चतुर्दशोऽध्यायः

तद्यथा पुरुषस्य धनं यत्किञ्चिद्धर्मौपयिकं१ बहुकृच्छ्राधिगतं साक्षात्परमपुरुषाराधनलक्षणो२ योऽसौ धर्मस्तं तु साम्पराय उदाहरन्ति। तद्धर्म्यं धनं द३र्शनस्पर्शनश्रवणास्वादनावघ्राणसङ्कल्पव्यवसायगृहग्राम्योपभोगेन कुनाथस्य अजितात्मनो यथा सार्थस्य४ विलुम्पन्ति॥ २॥ अथ च यत्र कौटुम्बिका दारापत्यादयो नाम्ना कर्मणा वृकसृगाला एवानिच्छतोऽपि कदर्यस्य कुटुम्बिन उरणकवत्संरक्ष्यमाणं मिषतोऽपि५ हरन्ति॥ ३॥ यथा ह्यनुवत्सरं कृष्यमाणमप्यदग्धबीजं क्षेत्रं पुनरेवावपनकाले गुल्मतृणवीरुद्भिर्गह्वरमिव भवत्येवमेव गृहाश्रमः कर्मक्षेत्रं यस्मिन्‍न हि कर्माण्युत्सीदन्ति यदयं कामकरण्ड एष आवसथः॥ ४॥✎ 941

atha ca yatra kauṭumbikā dārāpatyādayo nāmnā karmaṇā vṛkasṛgālā evānicchato'pi kadaryasya kuṭumbina uraṇakavatsaṃrakṣyamāṇaṃ miṣato'pi haranti|| 3||

अर्थ

ये ही नहीं, उस संसार-वनमें रहनेवाले उसके कुटुम्बी भी—जो नामसे तो स्त्री-पुत्रादि कहे जाते हैं, किन्तु कर्म जिनके साक्षात् भेड़ियों और गीदड़ोंके समान होते हैं—उस अर्थलोलुप कुटुम्बीके धनको उसकी इच्छा न रहनेपर भी उसके देखते-देखते इस प्रकार छीन ले जाते हैं, जैसे भेड़िये गड़रियोंसे सुरक्षित भेड़ोंको उठा ले जाते हैं॥ ३॥

टिप्पणियाँ

  1. १

    प्रा० पा०—यत्किंचित्साक्षाद्धर्मौप।

    (मुद्रित पृष्ठ 631)
  2. २

    प्रा० पा०—यत् परमपुरुषा०।

    (मुद्रित पृष्ठ 631)
  3. ३

    प्रा० पा०—दर्शनस्वादनावघ्राणसङ्कल्प-संव्यवसाय०।

    (मुद्रित पृष्ठ 631)
  4. ४

    प्रा० पा०—यथा सार्थिकस्य त०।

    (मुद्रित पृष्ठ 631)
  5. ५

    प्रा० पा०—निमिषतो०।

    (मुद्रित पृष्ठ 631)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #941 शब्दोंके बीचका स्थान: मिषतोऽपिहरन्ति॥ → मिषतोऽपि हरन्ति॥

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