श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.14.4

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 14 · अथ चतुर्दशोऽध्यायः

तद्यथा पुरुषस्य धनं यत्किञ्चिद्धर्मौपयिकं१ बहुकृच्छ्राधिगतं साक्षात्परमपुरुषाराधनलक्षणो२ योऽसौ धर्मस्तं तु साम्पराय उदाहरन्ति। तद्धर्म्यं धनं द३र्शनस्पर्शनश्रवणास्वादनावघ्राणसङ्कल्पव्यवसायगृहग्राम्योपभोगेन कुनाथस्य अजितात्मनो यथा सार्थस्य४ विलुम्पन्ति॥ २॥ अथ च यत्र कौटुम्बिका दारापत्यादयो नाम्ना कर्मणा वृकसृगाला एवानिच्छतोऽपि कदर्यस्य कुटुम्बिन उरणकवत्संरक्ष्यमाणं मिषतोऽपि५ हरन्ति॥ ३॥ यथा ह्यनुवत्सरं कृष्यमाणमप्यदग्धबीजं क्षेत्रं पुनरेवावपनकाले गुल्मतृणवीरुद्भिर्गह्वरमिव भवत्येवमेव गृहाश्रमः कर्मक्षेत्रं यस्मिन्‍न हि कर्माण्युत्सीदन्ति यदयं कामकरण्ड एष आवसथः॥ ४॥✎ 941

yathā hyanuvatsaraṃ kṛṣyamāṇamapyadagdhabījaṃ kṣetraṃ punarevāvapanakāle gulmatṛṇavīrudbhirgahvaramiva bhavatyevameva gṛhāśramaḥ karmakṣetraṃ yasminna hi karmāṇyutsīdanti yadayaṃ kāmakaraṇḍa eṣa āvasathaḥ|| 4||

अर्थ

जिस प्रकार यदि किसी खेतके बीजोंको अग्‍निद्वारा जला न दिया गया हो, तो प्रतिवर्ष जोतनेपर भी खेतीका समय आनेपर वह फिर झाड़-झंखाड़, लता और तृण आदिसे गहन हो जाता है—उसी प्रकार यह गृहस्थाश्रम भी कर्मभूमि है, इसमें भी कर्मोंका सर्वथा उच्छेद कभी नहीं होता, क्योंकि यह घर कामनाओंकी पिटारी है॥ ४॥

टिप्पणियाँ

  1. १

    प्रा० पा०—यत्किंचित्साक्षाद्धर्मौप।

    (मुद्रित पृष्ठ 631)
  2. २

    प्रा० पा०—यत् परमपुरुषा०।

    (मुद्रित पृष्ठ 631)
  3. ३

    प्रा० पा०—दर्शनस्वादनावघ्राणसङ्कल्प-संव्यवसाय०।

    (मुद्रित पृष्ठ 631)
  4. ४

    प्रा० पा०—यथा सार्थिकस्य त०।

    (मुद्रित पृष्ठ 631)
  5. ५

    प्रा० पा०—निमिषतो०।

    (मुद्रित पृष्ठ 631)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #941 शब्दोंके बीचका स्थान: मिषतोऽपिहरन्ति॥ → मिषतोऽपि हरन्ति॥

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