श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.14.42

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 14 · अथ चतुर्दशोऽध्यायः

तस्येदमुपगायन्ति—

आर्षभस्येह राजर्षेर्मनसापि महात्मनः।

नानुवर्त्मार्हति नृपो मक्षिकेव गरुत्मतः॥ ४२

tasyedamupagāyanti—

ārṣabhasyeha rājarṣermanasāpi mahātmanaḥ|

nānuvartmārhati nṛpo makṣikeva garutmataḥ|| 42

अर्थ

राजन्! राजर्षि भरतके विषयमें पण्डितजन ऐसा कहते हैं—‘जैसे गरुडजीकी होड़ कोई मक्खी नहीं कर सकती, उसी प्रकार राजर्षि महात्मा भरतके मार्गका कोई अन्य राजा मनसे भी अनुसरण नहीं कर सकता॥ ४२॥

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